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Monday, 14 July 2008

बहू के उत्पीड़न से तंग सास ने, बेटों के साथ, आत्महत्या की

महोबा में, बहू द्वारा दहेज उत्पीड़न का झूठा मुकद्दमा दर्ज कराने और उसके बाद जेल जाने से शर्मशार एक मां ने अपने दो जवान बेटों के साथ कीटनाशक पीकर आत्महत्या कर ली। इस मामले में पुलिस ने लड़के की पत्नी, साले, साली, सास और ससुर के खिलाफ आत्महत्या के लिए विवश करने का मामला दर्ज किया है। आत्महत्या करने के 24 घंटे बाद तक मां सरमन, बेटे प्रमोद व आमोद के शव पलंग पर पड़े रहे। घर पर कोई हलचल न होने और आवाज देने पर भी कोई जवाब न आने पर पड़ोसियों ने पुलिस को सूचित किया। 10 जुलाई की रात को पुलिस ने अंदर लगा ताला तोड़कर प्रवेश किया तो उसने तीनों को मृत अवस्था में पडे़ पाया।

पुलिस ने 11 जुलाई को मृतक प्रमोद की पत्नी गायत्री उर्फ प्रेम कुमारी, साले दिलीप, सास फूलकली उर्फ कलावती, साली दयावती तथा ससुर भोलाराम के विरूद्ध धारा 306 के तहत मुकद्दमा पंजीकृत किया गया है। पुलिस को 12 पृष्ठों का सुसाइड नोट मिला है। इसमें कहा गया है कि प्रमोद की पत्नी प्रेमकुमारी व उसके परिवारजनों द्वारा उनके खिलाफ दहेज उत्पीड़न का झूठा मुकद्दमा पंजीकृत कराया गया था।
(समाचार स्त्रोत: दैनिक सहारा)

8 comments:

राज भाटिय़ा said...

वाह री आधुनिक नारी,आज यह घर घर की कहानी हे.

अरुण said...

ये कहानिया आजकल बहुत है जी.पत्रकारो और इन नारी मुक्ती वालो ने बहुतो को मुक्त किया है

Cyril Gupta said...

पीड़ितों की मदद के लिये बने कानून का इस्तेमाल पीड़ित करने के लिये किया जा रहा है. शर्मनाक.

Mired Mirage said...

दहेज लेना व देना दोनों ही गलत हैं। ऐसी घटनाएँ भी होंगी ही। जब समाज के किसी भी पीड़ित समुदाय को अधिकार देने का यह अर्थ लगाया जाएगा कि किसी अन्य के सम्मान से जीने के अधिकार को छीन लिया जाए तो यही होगा। अधिकार देने का अर्थ जब जब यह लगाया जाएगा कि किसी अन्य से छीनकर दिया जाना तो यही सब होगा। ना सारे वर पक्ष वाले बुरे होते हैं न सारे कन्या पक्ष वाले भले। सबसे अच्छा तो यह हो कि ऐसी दुखदायक शादियाँ भंग कर दी जाएँ, न कि उन्हें एक दूसरे पर लाँछन लगाने के लिए उपयोग किया जाए। जब भी नए मिले अधिकारों का ऐसे दुरुपयोग होता है तब जिन्हें इन अधिकारों से न्याय मिलने की सच में आवश्यकता है उन पर भी शक किया जाता है।
घुघूती बासूती

Udan Tashtari said...

शर्मनाक.

सुजाता said...

बलबिन्दर जी ,
आपके ब्लॉग का नाम "ये है औरत ?" कुछ ठीक सुनाई नही देता । हालांकि आपने स्पष्टीकरण दिया है , तो भी यह स्त्री लेखन की प्रतिक्रिया में किया गया काम जैसा लगता है ।
खैर आप स्वतंत्र हैं , अपने विचारों को जैसे चाहें प्रस्तुत करें , पर आँधियों को रोकना अब सम्भव नही !धूल तो आँख में पड़ेगी ही , आप लाख कोशिश करें बचने बचाने की :-)

बलबिन्दर said...

@सुजाता
सुजाता जी, आपने बात जिस इमोशिकॉन, :-), पर खत्म की है, उसी को ध्यान में रख कर पढ़ियेगा।

यह स्त्री लेखन की प्रतिक्रिया में किया गया काम जैसा …
कौन से स्त्री लेखन की बात कर रहीं हैं आप, महाश्वेता जी की? अमृता प्रीतम जी की? अरूंधती राय जी की? सुधा मूर्ति जी की? या फिर अनिता देसाई जी की?
वैसे स्त्री लेखन तो शोभा डे जी भी करती हैं।

… और रही बात आँधियों की, तो जहां भी देखियेगा, पाईयेगा कि आंधियाँ कभी भी निर्माण नहीं करतीं, वे हमेशा विध्वंसकारी ही होतीं हैं।
शायद इसीलिये विश्व की महाविनाशकारी आंधियों/ तूफानों के नाम स्त्रीलिंगीय होते हैं, चाहे वह अमेरिका में कैटरीना हो या भारत में नरगिस!

आंधी को देखकर, अपनी आंखे बंद करना ही बुद्धिमानी होती है, उस पर भी दोनों हाथ चेहरे पर रख लेना तो और सुरक्षित।

शायद इसीलिये तो आज कथित समाज के सामने आंखे बंद करने की नौबत आ रही है, आंधियों को देखकर!

जैसा कि पहले भी लिखा गया है, इस ब्लॉग पर मेरे विचार तो हैं ही नहीं।

:-()

सुजाता said...

यूँ मै विध्वन्स करना नही चाहती पर उसे बुरा भी नही मान रही । विध्वंस तो ज़रूरी है , पुराना नही ढहेगा तो नया नही बनेगा ।
और अब तक टालने की कोशिश में आखें बन्द किये रहे तभी तो तूफान की नौबत आयी है ।

ब्लॉग पर जो स्त्री लेखन आरम्भ हुआ है चोखेर बाली के बाद , उसी की प्रतिक्रिया है आपका ब्लॉग , नारी की कहानी , जेंडर डिफरेंस वाला ब्लॉग !
इतना भयभीत क्यों हैं आप सब ?? कोई तर्क सहित और कोई भावुक होकर नारीवाद की धज्जियाँ उड़ाना चाह रहा है , और यह तब जब कि ब्लॉग पर कोई भी स्त्री यह नही कहती कि पुरुष का साथ उसे नही चाहिये या पुरुष उनके लिए गैर ज़रूरी हैं या परिवारों को खत्म कर दो !

कृपया प्रतिक्रियावादी न बनें !